Shiksha News Kolkata। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कार्य में लगे न्यायिक अधिकारियों को कथित तौर पर बंधक बनाने, हिंसक विरोध प्रदर्शन और रास्ता जाम करने के मामले में पश्चिम बंगाल के मालदा जिले से 14 और लोगों को गिरफ्तार किया है। यह मामला एक अप्रैल को मालदा के कालियाचक-द्वितीय ब्लॉक के मोथाबारी में हुई घटना से जुड़ा है। वहाँ मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का विरोध कर रही एक उग्र भीड़ ने तीन महिला अधिकारियों सहित सात न्यायिक अधिकारियों को कई घंटों तक कथित तौर पर बंधक बना लिया था।
एनआईए की टीमों ने सोमवार देर रात मालदा के कालियाचक और मोथाबारी में कई ठिकानों पर छापेमारी कर ये गिरफ्तारियां कीं। सोमवार रात हुई इन गिरफ्तारियों के बाद इस घटना के सिलसिले में पकड़े गए लोगों की कुल संख्या बढ़कर 68 हो गई है।
उल्लेखनीय है कि अप्रैल में जब ये न्यायिक अधिकारी मतदाता सूची के सत्यापन कार्य की निगरानी के लिए तैनात थे, तब सैकड़ों निवासी ब्लॉक विकास कार्यालय (बीडीओ) के बाहर जमा हो गए। उनका आरोप था कि वास्तविक मतदाताओं के नाम सूची से गलत तरीके से हटा दिए गए हैं।
तनाव बढ़ने पर प्रदर्शनकारियों ने अधिकारियों को लगभग नौ घंटे तक परिसर से बाहर नहीं निकलने दिया। प्रदर्शनकारी हटाए गए नामों को तुरंत वापस जोड़ने की मांग कर रहे थे और उन्होंने प्रशासन पर पुनरीक्षण कार्य के दौरान मनमाने ढंग से नाम हटाने का आरोप लगाया।
स्थिति तब और बिगड़ गई जब पुलिस ने शाम को अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकालने की कोशिश की। इस दौरान काफिले के वाहनों पर कथित तौर पर हमला किया गया, सुरक्षाकर्मियों पर पथराव हुआ और बांस की बल्लियां लगाकर रास्ते जाम कर दिए गए। पुलिस की पायलट गाड़ी के एक चालक को ईंट लगने से गंभीर चोटें आईं। इस घटना ने न्यायिक और राजनीतिक हलकों में व्यापक चिंता पैदा कर दी थी। बाद में उच्चतम न्यायालय ने भी इस हमले का संज्ञान लेते हुए कहा था कि चुनाव संबंधी कर्तव्यों का पालन कर रहे अधिकारियों को रोकना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सीधी चुनौती है।
इस हिंसा के बाद स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं सहित कई लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद एनआईए ने जांच अपने हाथ में ले ली और वह इस बात की जांच कर रही है कि क्या यह अशांति पहले से योजनाबद्ध और संगठित थी।
जांचकर्ता इन आरोपों की भी जांच कर रहे हैं कि क्या कुछ ग्रामीणों को जबरन या डरा-धमकाकर इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया था।

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